Puja Stotra, stotram

Stotra | स्तोत्र

Stotra/Stotram (स्तोत्र): is a Sanskrit word, which means “Ode, Eulogy or A Hymn of Praise”. It is a literary genre of Indian texts designed to be melodically sung, in contrast to shastra which are composed to be recited. A Stotra can be a prayer, a description, or a conversation, but always with a poetic structure. They are the hymns written to praise the god. Suktam & Stotra both have same purpose to pray to god.  A set of shlokas compiled together is called a stotram.

A stotram is an extract from a religious scripture but generally poetic in the praise of God, emphasizing His qualities or describing Him as supreme. stotram comes from the word Sthuthi and Sthuthi means praise. Some stotram are also called as Sthavas. stotram could be broadly translated as “Praise of God”.

Stotra (stotram) can be broadly classified according the time period as those originating during period of Vedas, period of the Puranas  and post Purana Stotra or according to the style in which they are written. Stotra are useful for cutting away at karma. They are not bound by the rules that Shruti (Stotra) such as the Vedas are bound by, so therefore, they are accessible by the everyday householder.

पूजा के लिए स्तोत्र

हिन्दू धर्म के अनुसार संस्कृत साहित्य में किसी देवी-देवता की स्तुति में लिखे गये काव्य को स्तोत्र (Stotra) कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में यह स्तोत्र काव्य के अन्तर्गत आता है। स्तोत्र का पाठ वाचिक और कंठ स्वर से होता है, जो एक प्रकार से देवी-देवता की स्तुति ही है। स्तोत्र का पाठ पूजा, मन्त्र जाप, हवन आदि के अंत में करना शुभ माना गया है, स्तोत्र के पाठ से सम्बंधित देवी-देवता और गुरु शीघ्र ही प्रसन्न होते है और पूजा, मन्त्र जाप, साधना, हवन में  संकल्प  के अनुसार फल प्रदान करते है। ऐसा जरुरी नही होता की स्तोत्र का पाठ संस्कृत में करना चाहिए, श्रदा विश्वास के साथ स्तोत्र का पाठ हिन्दी में करने से भी लाभ की प्राप्ति होती है।

महाकवि कालिदास के अनुसार ‘स्तोत्रं कस्य न तुष्टये’ अर्थात् विश्व में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो स्तोत्र से प्रसन्न न हो जाता हो। इसलिये विभिन्न देवताओं को प्रसन्न करने हेतु वेदों, पुराणों तथा काव्यों में सर्वत्र सूक्त तथा स्तोत्र भरे पड़े हैं। अनेक भक्तों द्वारा अपने इष्टदेव की आराधना हेतु स्तोत्र रचे गये हैं। विभिन्न स्तोत्रों का संग्रह स्तोत्र रत्नावली के नाम से उपलब्ध है। शुभ मुहूर्त में या पूजा, मन्त्र जाप के बाद सम्बंधित देवी-देवता के स्तोत्र का पाठ अवश्य ही करना चाहिए। स्तोत्र  पूजा का एक अभिन्य अंग होता है।

“अ” से “द” तक स्तोत्र

“द” से “ल” तक स्तोत्र

“ल” से “श्र” तक स्तोत्र

“श्र” से “ह” तक स्तोत्र