Grahan, ग्रहण

Grahan

Grahan/ग्रहण : It takes place when one heavenly body such as a moon or planet moves into the shadow of another heavenly body. There are two types of eclipses on Earth: an eclipse of the moon and an eclipse of the sun. A total solar eclipse (Grahan) is a cosmic coincidence with stunning visual effects for viewers on Earth. When the moon passes in front of the sun and blocks it completely, it casts a shadow onto our planet that plunges areas into a darkness that feels like night time in mid-day. What causes this extraordinary phenomenon?

Several things need to occur at once to create a total solar eclipse/Grahan. First, the moon needs to be exactly the right size to block the sun. Next, the sun, moon, and Earth need to line up in a straight line, or nearly so, with the moon between the sun and Earth. Finally, to see the full eclipse, you need to be standing in the correct spot on Earth.

Lucky for us, our moon is the perfect size. When it passes in front of the sun, it exactly covers the sun’s central disk, while letting the corona shine out around it in a spectacular display. The two bodies aren’t really the same size, of course: the sun is 400 times the diameter of the moon. But it’s also 400 times farther away from us, and this relationship between size and distance makes the sun and the moon appear the same size. It’s a wonderful coincidence, and should not be taken for granted—Earth is the only planet in our solar system with a moon the proper size and distance to cause the striking solar eclipses (Grahan) we see.

The motions of sun, moon, and Earth bring the three bodies into the correct alignment about once every 18 months. These are the times when eclipses can happen. As the daytime moon passes in front of the sun, it begins to cast a partial shadow (called the penumbra) onto Earth. At the height of the eclipse (Grahan), the sun’s light is entirely blocked, and the moon casts a full shadow called the umbra. Eclipse/Grahan is considered to be a famous festival. When Sun and Moon comes under same zodiac sign it is on a new moon night.

Being in the same zodiac sign the Sun is covered and then solar eclipse happens. On the full moon day Moon is covered and then lunar eclipse happens. The constellation under which the eclipses/Grahan happen, it leaves its influence for six months. It means in that constellation period no auspicious performance can be done. Since god’s 96 minutes is 6 months for us. The performances will be affected by the eclipse.

The effects of eclipses not only fall on us but to animals too. In business also it is soon it spreads its effect. On business effect of total eclipse remains up to 6 months and three constellations eclipse remains up to 4 months and effects of partial eclipse remains for 3 months. So as per the scripture auspicious works are to be done besides the said periods. The eclipses/Grahan cause war and price rise of commodities.

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ग्रहण क्यों होते है ?

सौर मंडल में सूर्य अपने कान्ति-मण्डल व चन्द्र अपने विमंडल के अनुसार अपनी-अपनी कक्षा में परिभ्रमण करते रहते है और सूर्य से 6 राशि के अंतर पर पृथ्वी की छाया अपनी कक्षा में रहती है। इस प्रकार हर पूर्णिमा को सूर्य और चन्द्र में भी 6 राशि का अंतर होता है। अत: पूर्णिमा को पृथ्वी की छाया व चन्द्र एक समान होता है। जब सूर्य, पृथ्वी, चन्द्र एक सीध में होते है तब पृथ्वी की छाया चन्द्र को ढक लेती है, उस समय “चन्द्र-ग्रहण” होता है। यदि पूर्ण रूप से ढके तो खग्रास (पूर्ण) ग्रहण और यदि चन्द्र के किसी अंश को ढके तो अपूर्ण (खण्ड) ग्रहण होता है। इसी प्रकार अमावस्या को सूर्य व चन्द्र एक राशिगत अपनी-अपनी कक्षा में परिभ्रमण करते है। जब पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य एक सीध में होते है तब चन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है, उस समय “सूर्य ग्रहण” होता है। ढकने की क्रिया जितनी होती है उसी प्रकार से खण्ड, खग्रास आदि ग्रहण भी होता है। पर यह स्थिति भौगोलिक है। किन्तु ज्योतिष के अनुसार राहु का चन्द्र या सूर्य को ग्रास कर लेना या ढकना ही ग्रहण/Grahan है।

पुराणों में राहु के विषय में जो कल्पना बताई गई है। वह वास्तव में वेद, पुराण व संहिता के मतानुसार गणित और खगोल के साथ भी अपना मेल खाती है। राहु को एक छाया माना गया है और यह छाया पृथ्वी की ही छाया है। अत: पृथ्वी की छाया को ही राहु ग्रह का रूप कहना चाहिए। ग्रहण प्रसिद्ध पर्व माना गया है। सूर्य, चन्द्र जब एक राशिगत होते है तो अमावस्या का पर्व होता है। सूर्य को चन्द्रमा एक राशि में रहने के कारण अपने कक्षान्तरों में मेघों की भांति आच्छादित कर लेता है, तब सूर्य ग्रहण होता है। जब अमावस्या दिन में ही समाप्त हो जाती है और प्रतिपदा लगती है तो सूर्य ग्रहण का मध्य-काल होता है।

पूर्णिमा के दिन चन्द्र को पृथ्वी की छाया आच्छादित कर लेती है, तब चन्द्र-ग्रहण होता है। जब रात्रि को पूर्णिमा समाप्त होती है और प्रतिपदा लगती है, तो चन्द्र-ग्रहण का मध्य-काल होता है। यह पर्व के मध्य में स्थित होती है। जिस नक्षत्र पर सूर्य या चन्द्र का ग्रहण होता है, पृथ्वी पर 6 महीने तक उसका प्रभाव रहता है। यहाँ तक कि उस नक्षत्र को शुभ कार्यो में 6 मास तक ग्रहण भी नहीं किया जाता। क्योंकि देवताओं की चार घड़ी [96 मिनट] हमारे लिए 6 मास के बराबर होती है। सम्पूर्ण शुभ कार्यो पर सूर्य व चन्द्र के ग्रहण/Grahan का प्रभाव पड़ता है। हमारे जीवन में जिस प्रकार से शुभ कार्यो पर सूर्य व चन्द्र-ग्रहण का प्रभाव होता है, उसी प्रकार से मनुष्य, जीव, जन्तु सभी पर होता है।

व्यापारिक वस्तुओं में भी इसके प्रभाव से घट-बढ़ देखा गया है। इन सभी पर खग्रास ग्रहण/Grahan का प्रभाव 6 मास तक व त्रिपाद ग्रहण का 5 मास तक तथा आधे ग्रहण का 4 मास तक और एक हिस्से ग्रहण का 3 मास तक प्रभाव माना गया है एवं सूर्य व चन्द्र के पूर्ण ग्रहण में सात दिन, त्रिपाद ग्रहण में 5 दिन, आधे ग्रहण में 4 दिन व चौथाई ग्रहण में 3 दिन छोड़कर शुभ कार्यो के करने की शास्त्र आज्ञा है। सूर्य या चन्द्र का ग्रहण/Grahan ग्रस्तोदय या ग्रस्तास्त हो तो खाने की चीजों में तेजी हो और युद्ध की सम्भावना की आशंका होती है।